अकाल में रोजगार देने के लिए बनवाया था मंदिर, आज 24 फीट ऊंचे गणेश के दरबार में पूरी होती हैं मन्नतें…
रतलाम से करीब 41 किलोमीटर दूर पिपलोदा में विराजमान हैं 24 फीट ऊंचे गणेशजी, दाईं ओर सूंड वाले सिद्धिविनायक स्वरूप की है विशेष मान्यता...

(www.csnn24.com) रतलाम/ पिपलोदा। रतलाम जिले के पिपलोदा नगर में भगवान गणेश का एक ऐसा प्राचीन और भव्य मंदिर है, जो अपनी 24 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा के कारण अलग पहचान रखता है। मंदिर में विराजित गणेशजी की सूंड दाईं ओर है, जिसे धार्मिक मान्यताओं में सिद्धिविनायक स्वरूप माना जाता है। यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन और मन्नत के लिए पहुंचते हैं।
इस मंदिर का इतिहास करीब 128 वर्ष पुराना बताया जाता है। पिपलोदा रियासत के तत्कालीन महाराजा मंगल सिंह डोड़िया ने इस विशाल गणेश मंदिर के साथ अपनी कोठी का निर्माण भी करवाया था। लेकिन इस निर्माण के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि अकाल के दौर में अपनी प्रजा को सम्मानजनक रोजगार देने की सोच भी जुड़ी हुई थी।
अकाल में बांटा नहीं, रोजगार दिया
पिपलोदा राजवंश की विरासत संभाल रहीं राजकुमारी संघमित्रा सिंह के अनुसार, करीब 1896 के आसपास क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा था। ऐसे समय में महाराजा मंगल सिंह डोड़िया चाहते थे कि लोगों को केवल मुफ्त अनाज या आर्थिक सहायता देने के बजाय ऐसा काम मिले, जिससे वे अपनी मेहनत से परिवार का पालन-पोषण कर सकें।
इसी सोच के तहत वर्तमान केसर विलास पैलेस यानी पिपलौदा कोठी और उसके पास विशाल गणेश मंदिर के निर्माण की शुरुआत कराई गई। निर्माण कार्य में क्षेत्र के सैकड़ों मजदूरों और कारीगरों को कई महीनों तक काम मिला। उन्हें मजदूरी के रूप में अनाज और मुद्रा दी जाती थी। इस तरह अकाल की कठिन परिस्थितियों में भी बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका चलती रही।
जयपुर से आए कारीगर ने बनाई प्रतिमा
स्थानीय जानकारी के अनुसार मंदिर, कोठी और गणेश प्रतिमा के निर्माण में राजस्थान से आए कारीगरों के साथ स्थानीय लोगों ने भी योगदान दिया था। 24 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा को विशेष प्रकार के पत्थर, चूना, बेल के गोंद, गुड़ और अन्य पदार्थों के मिश्रण से तैयार किए जाने की बात कही जाती है। बताया जाता है कि जयपुर से आए मूर्तिकार गजानंद ने इस प्रतिमा को आकार दिया था।
इसलिए कहलाते हैं ‘मंशापूर्ण गणेश’
मंदिर से जुड़ी लोक मान्यता के अनुसार, महाराजा ने जिस निस्वार्थ भावना से अकाल के समय लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से मंदिर का निर्माण कराया, वह भावना भगवान गणेश को प्रिय हुई। इसी कारण यहां विराजित गणेशजी को ‘मंशापूर्ण गणेश’ कहा जाने लगा।
श्रद्धालुओं की आस्था है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। विवाह, संतान प्राप्ति और व्यापार से जुड़ी मनोकामनाओं को लेकर भी बड़ी संख्या में लोग मंदिर पहुंचते हैं। हालांकि ये धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनमें श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है।
आज भी आस्था और इतिहास का संगम
मंदिर परिसर के केयरटेकर भंवर सिंह के मुताबिक, मंदिर निर्माण को करीब 128 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी यहां श्रद्धालुओं की आस्था बनी हुई है। विशाल प्रतिमा, दाईं ओर मुड़ी सूंड, प्राचीन निर्माण शैली और इसके पीछे जुड़ी अकाल के समय रोजगार उपलब्ध कराने की कहानी इस मंदिर को खास बनाती है।
पिपलोदा का यह मंदिर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था के साथ इतिहास और मानवीय संवेदना की कहानी भी जुड़ी हुई है। करीब सवा सौ साल पहले अकाल के बीच लोगों को काम देने के उद्देश्य से शुरू हुआ निर्माण आज एक ऐसे धार्मिक स्थल के रूप में सामने है, जहां इतिहास, विरासत और आस्था एक साथ दिखाई देते हैं।





