रतलाम का 300 साल पुराना द्वारकाधीश मंदिर: रात में गर्भगृह से गायब हो जाते थे ‘नटखट कान्हा’, भोग नहीं मिला तो पहुंच गए हलवाई की दुकान!….
सोने की मंडी और चांदनी चौक के बीच स्थित प्राचीन मंदिर से जुड़ी हैं आस्था और चमत्कार की अनोखी कथाएं...

(www.csnn24.com) रतलाम। क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहां रात में मंदिर के पट बंद होने के बाद भगवान की प्रतिमा अपने स्थान से गायब हो जाती थी? यह सुनने में भले ही आश्चर्यजनक लगे, लेकिन रतलाम शहर के बीचोंबीच स्थित करीब 300 वर्ष पुराने द्वारकाधीश मंदिर से जुड़ी ऐसी कई मान्यताएं आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं।
सोने की मंडी और चांदनी चौक के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की अनोखी और नटखट लीलाओं से जुड़ी लोककथाओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां विराजमान भगवान द्वारकाधीश को श्रद्धालु स्नेहपूर्वक ‘नटखट कान्हा’ कहकर पुकारते हैं।
रात में अपने स्थान से गायब हो जाते थे भगवान
मंदिर से जुड़ी सबसे प्रचलित और रोचक मान्यता भगवान द्वारकाधीश की प्रतिमा के रात में अपने स्थान से गायब हो जाने की है। बुजुर्गों और मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, पुराने समय में कई बार ऐसा हुआ कि रात में मंदिर के पट बंद किए गए, लेकिन सुबह जब गर्भगृह खोला गया तो भगवान की प्रतिमा अपने निर्धारित स्थान पर नहीं मिली।
मान्यता है कि जब भगवान की खोज की जाती थी तो प्रतिमा उस स्थान पर मिलती थी, जहां से उन्हें मंदिर में लाया गया था। इस घटना के बार-बार होने पर श्रद्धालुओं ने इसे भगवान श्रीकृष्ण की नटखट लीला मान लिया।
कहा जाता है कि भक्तों को यह चिंता सताने लगी थी कि कहीं उनके आराध्य भगवान उन्हें छोड़कर हमेशा के लिए न चले जाएं। इसके बाद भगवान को विशेष रूप से अभिमंत्रित रेशमी धागे से बांधने की परंपरा शुरू की गई।
पुजारी भोग लगाना भूल गए तो पेड़े खाने निकल पड़े कान्हा
द्वारकाधीश मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा चांदनी चौक की एक पुरानी मिठाई की दुकान से संबंधित है।
लोकमान्यता के अनुसार, एक दिन मंदिर के पुजारी भगवान को पेड़ों का भोग लगाना भूल गए। रात होने पर जब भगवान को भोग नहीं मिला तो ‘नटखट कान्हा’ बाल रूप में मंदिर से निकलकर चांदनी चौक स्थित कलीराम बा की मिठाई की दुकान पर पहुंच गए।
बताया जाता है कि बालक के रूप में पहुंचे कान्हा ने वहां पेड़े खाए। जब हलवाई ने पेड़ों की कीमत मांगी तो उस बालक के पास नकद पैसे नहीं थे।
पेड़ों के बदले उतारकर दे दिए सोने के कंगन
मान्यता के अनुसार, पेड़ों का मूल्य चुकाने के लिए बाल रूप में आए भगवान कृष्ण ने अपने हाथों में पहने हुए सोने के कंगन उतारकर हलवाई को दे दिए।
हलवाई ने उस बालक को एक सामान्य बच्चा समझा और सोने के कंगन अपनी दुकान की तिजोरी में रख लिए। इसके बाद वह बालक वहां से चला गया।
सुबह खुले मंदिर के पट तो भगवान के हाथों से गायब थे कंगन
अगली सुबह जब मंदिर के पट खोले गए तो वहां मौजूद लोगों के सामने एक नया आश्चर्य खड़ा था। भगवान द्वारकाधीश की प्रतिमा के हाथों में पहने जाने वाले सोने के कंगन गायब थे।
मंदिर से जुड़े लोगों के बीच इस घटना को लेकर चिंता बढ़ गई। इसी दौरान मंदिर की स्थापना से जुड़े काशीराम जी पालीवाल को लेकर एक प्राचीन मान्यता प्रचलित है।
कहा जाता है कि भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर पूरी घटना बताई। मान्यता के अनुसार, भगवान ने स्वप्न में कहा कि उन्हें भोग नहीं मिला था, इसलिए वे पेड़े खाने कलीराम बा की दुकान पर गए थे और पेड़ों के बदले अपने सोने के कंगन वहां छोड़ आए।
तिजोरी खुली तो मिले भगवान के कंगन
स्वप्न की बात सामने आने के बाद काशीराम जी पालीवाल और मंदिर से जुड़े अन्य लोग मिठाई की दुकान पर पहुंचे। वहां हलवाई से पूरी बात पूछी गई और दुकान की तिजोरी खोली गई।
लोकमान्यता के अनुसार, तिजोरी में वही सोने के कंगन रखे हुए मिले। इसके बाद पेड़ों की कीमत चुकाई गई और भगवान के कंगन वापस मंदिर लाकर पुनः द्वारकाधीश की प्रतिमा को पहनाए गए।
यह कथा आज भी मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित धार्मिक मान्यताओं में शामिल है।
सात दरवाजों के पार विराजे हैं द्वारकाधीश
इस प्राचीन मंदिर की संरचना भी लोगों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं में इसके सात दरवाजों का विशेष उल्लेख किया जाता है।
पालीवाल परिवार से जुड़े इस मंदिर में लगभग तीन शताब्दियों से भगवान द्वारकाधीश की पूजा-अर्चना की परंपरा निरंतर चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी मंदिर की सेवा और पूजा की जिम्मेदारी निभाई जा रही है।
आस्था, इतिहास और लोककथाओं का अनोखा संगम
आज मंदिर से जुड़ी इन घटनाओं को कोई चमत्कार मानता है, कोई इसे अटूट आस्था की कहानी कहता है तो कुछ लोग इन्हें सदियों पुरानी लोकमान्यताओं का हिस्सा मानते हैं।
लेकिन एक बात तय है कि करीब 300 वर्ष बाद भी रतलाम के इस प्राचीन द्वारकाधीश मंदिर और ‘नटखट कान्हा’ से जुड़ी ये रोचक कथाएं लोगों की जुबान पर जीवित हैं।
सोने की मंडी की व्यस्त गलियों और चांदनी चौक की चहल-पहल के बीच स्थित यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है, बल्कि रतलाम के गौरवशाली इतिहास, धार्मिक परंपराओं और भगवान श्रीकृष्ण की नटखट लीलाओं की एक जीवंत विरासत भी है।





