
www.csnn24.com| इस साल कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को है। इस दिन कई शुभ योगों का संयोग भी बन रहा है। साथ ही, बड़ी संख्या में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के लिए उपवास भी रखते हैं और मध्यरात्रि में पूजा के बाद व्रत का पारण करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस खास अवसर पर भक्त भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा-अर्चना कर उनका पंचामृत से अभिषेक करते हैं। साथ ही प्रभु का सुंदर श्रृंगार कर माखन-मिश्री समेत 56 प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं।
जन्माष्टमी की आधी रात जैसे-जैसे करीब आती है, भारत के मंदिरों और घरों में दीप जलने लगते हैं। मथुरा में कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती है, वृंदावन में उनकी बाल लीलाओं के गीत गूंजते हैं। गुजरात में वे द्वारकाधीश, ओडिशा में जगन्नाथ और कर्नाटक के उडुपी में भक्तों के प्रिय कृष्ण के रूप में पूजे जाते हैं। कृष्ण भारतीय संस्कृति के उन विरले चरित्रों में हैं, जो एक साथ ईश्वर, बालक, ग्वाला, मित्र, राजा, कूटनीतिज्ञ, सारथी और दार्शनिक हैं। यही विविधता उन्हें भारत के हर क्षेत्र और हर भाषा से जोड़ती है।अपितु देश ही नहीं वे इस्कॉन के कारन विदेशो में भी पूजे जाते है |
आधी रात को जन्म
परंपरा के अनुसार, मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया था। भविष्यवाणी थी कि देवकी की आठवीं संतान कंस के विनाश का कारण बनेगी। आधी रात को कृष्ण का जन्म हुआ और वसुदेव उन्हें यमुना पार कर गोकुल ले गए, जहां नंद और यशोदा ने उनका पालन-पोषण किया।
यहीं से कृष्ण की बाल लीलाओं की कहानी शुरू होती है – माखन चोर, गोपाल, बांसुरी वादक और गोपियों के प्रिय कृष्ण की। वृंदावन में वे गोवर्धन उठाते हैं, बांसुरी बजाते हैं और अपने सहज, मानवीय रूप से भक्तों के करीब आते हैं।
वृंदावन से द्वारका तक
समय के साथ कृष्ण वृंदावन से पश्चिम की ओर जाते हैं और समुद्र तट पर द्वारका बसाते हैं। यहां वे बाल गोपाल से राजा और कुशल राजनेता बन जाते हैं। द्वारका कृष्ण के नेतृत्व, जिम्मेदारी और कूटनीति के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।
द्वारका के समुद्र में मिले पुरातात्विक अवशेषों ने इस कथा को एक नया आयाम दिया है। हालांकि इन अवशेषों को महाभारत में वर्णित कृष्ण की द्वारका से निश्चित रूप से जोड़ना अभी भी शोध और सावधानी का विषय है। इतिहास और पुरातत्व जहां भौतिक प्रमाण तलाशते हैं, वहीं परंपरा स्मृति और आस्था को संभालती है।
एक कृष्ण, अनेक रूप
भारत के अलग-अलग हिस्सों में कृष्ण की छवि अलग दिखाई देती है। मथुरा में वे जन्मे बालक हैं, वृंदावन में गोपाल, द्वारका में राजा, पुरी में जगन्नाथ और उडुपी में भक्त की ओर मुड़ने वाले भगवान। उडुपी की परंपरा में कृष्ण और भक्त कनकदास की कथा विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि मंदिर में प्रवेश न मिल पाने पर कनकदास ने बाहर से प्रार्थना की और कृष्ण उनकी ओर मुड़ गए।
कला, संगीत और साहित्य में कृष्ण
कृष्ण भारतीय कला, संगीत, नृत्य और साहित्य का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। चित्रकला में वे माखन चुराते बालक और बांसुरी बजाते युवक के रूप में दिखाई देते हैं। कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी और मणिपुरी जैसे शास्त्रीय नृत्यों में उनकी कथाएं आज भी जीवंत हैं।
संगीत और कविता में कृष्ण प्रेम, विरह, भक्ति और समर्पण के प्रतीक बनते हैं। जयदेव, सूरदास और मीराबाई जैसे कवियों ने उन्हें अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। संस्कृत से लेकर ब्रज, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम तक हर भाषा ने अपने कृष्ण को गढ़ा।
कुरुक्षेत्र का कृष्ण
कृष्ण का एक और महत्वपूर्ण रूप कुरुक्षेत्र में सामने आता है पार्थसारथी, यानी अर्जुन के सारथी के रूप में। युद्धभूमि में अर्जुन के संशय के बीच कृष्ण उन्हें कर्म, धर्म, ज्ञान, भक्ति और आत्मा का संदेश देते हैं। यही संवाद भगवद्गीता के रूप में विश्व की महान दार्शनिक परंपराओं में शामिल हुआ।
कृष्ण आज भी क्यों प्रासंगिक हैं ?
कृष्ण को कोई बालक के रूप में देखता है, कोई मित्र या प्रियतम के रूप में, किसी के लिए वे द्वारकाधीश हैं तो किसी के लिए गीता के गुरु। कलाकार उन्हें नृत्य में खोजता है, संगीतकार सुरों में और भक्त अपने प्रेम में। शायद कृष्ण की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वे प्रेम, कर्तव्य, भक्ति और धर्म – इन सभी को एक साथ जोड़ते हैं।
जन्माष्टमी की आधी रात को जब मंदिरों में घंटियां बजती हैं और घरों में कृष्ण को पालने में झुलाया जाता है, तब हजारों वर्ष पुरानी कथा फिर से वर्तमान हो जाती है। कृष्ण की यात्रा केवल मथुरा से वृंदावन, द्वारका और कुरुक्षेत्र तक की नहीं है। यह शास्त्र से गीत तक, मंदिर से घर तक और इतिहास से जीवंत स्मृति तक की यात्रा है।




