जगन्नाथ रथयात्रा की परंपरा कैसे हुई प्रारंभ ?
जानिए जगन्नाथ पुरी के अनसुलझे रहस्य और चमत्कार ...

www.csnn24.com| ओडिशा स्थित जगन्नाथ पुरी का मंदिर देश के प्रमुख चार धामों में से एक है। यह सिर्फ अपनी धार्मिक महिमा के लिए ही नहीं, बल्कि विज्ञान और तर्क से परे कई अनसुलझे रहस्यों और चमत्कारों के लिए भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई हैं।
मंदिर के 45 मंजिला ऊंचे शिखर पर लगा लाल झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। वैज्ञानिक भी इस रहस्य को सुलझा नहीं पाए हैं। यह भी आश्चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है।
छाया का न दिखना
यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है।
हमारे पूर्वज कितने बड़े इंजीनियर रहे होंगे यह इस एक मंदिर के उदाहरण से समझा जा सकता है। पुरी के मंदिर का यह भव्य रूप 7वीं सदी में निर्मित किया गया।
चमत्कारिक सुदर्शन चक्र
पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।
गुंबद के ऊपर नहीं उड़ते पक्षी
दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर
समुद्र की ध्वनि
रथ यात्रा कब से और किस कारण से प्रारंभ हुई, इस संबंध में हमें कई तरह की कथाएं मिलती है …
जब राजा इंद्रद्युम ने जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां बनवाई तो रानी गुंडिचा ने मूर्तियां बनाते हुए मूर्तिकार विश्वकर्मा और मूर्तियों को देख लिया जिसके चलते मूर्तियां अधूरी ही रह गई तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में स्थापित होना चाहते हैं। इसके बाद राजा ने इन्हीं अधूरी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित कर दिया। उस वक्त भी आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी जन्मभूमि मथुरा जरूर आएंगे। स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार राजा इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है।
एक दूसरी कथा भी जिसके अनुसार सुभद्रा के द्वारिका दर्शन की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण और बलराम ने अलग-अलग रथों में बैठकर यात्रा की थी। सुभद्रा की नगर यात्रा की स्मृति में ही यह रथयात्रा पुरी में हर साल होती है। इस रथयात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है।
एक बार राधा रानी कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से मिलने पहुंची और वहां उन्होंने श्रीकृष्ण से वृंदावन आने का निवेदन किया। राधारानी के निेवेदन को स्वीकार करके एक दिन श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ वृंदावन के द्वार पहुंचे तो राधारानी, गोपियों और वृंदावनवासियों को इतनी खुशी हुई कि उन्होंने तीनों को रथ पर विराजमान करके उसके घोड़ों को हटाकर उस रथ को खुद की अपने हाथों से खींचकर नगर का भ्रमण कराया। इसके अलावा वृंदावनवासियों ने जग के नाथ अर्थात उन्हें जगन्नाथ कहकर उनकी जय-जयकार की। तभी यह यह परंपरा वृंदावन के अलावा जगन्नाथ में भी प्रारंभ हो गई।
चारण परम्परा के अनुसार भगवान द्वारिकाधीशजी के साथ, बलराम और सुभद्राजी का समुद्र के किनारे अग्निदाह किया गया था। कहते हैं कि उस वक्त समुद्र के किनारे तूफान आ गया और द्वारिकाधीशजी के अधजले शव पुरी के समुद्र के तट पर बहते हुए पहुंच गए। पुरी के राजा ने तीनों शवों को अलग-अलग रथ में विराजित करवाया और पुरे नगर में लोगों ने खुद रथों को खींचकर घुमाया और अंत में जो दारु का लकड़ी शवों के साथ तैर कर आई थी उसीसे पेटी बनवा कर उन शवों को उनमें रखकर उसे भूमि में समर्पित कर दिया। इस घटना की स्मृति में ही आज भी इस परंपरा को निभाया जाता है। चारणों की पुस्तकों में इसका उल्लेख मिलता।
हनुमानजी करते हैं जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा





