400 साल पुरानी अष्टधातु की ऐतिहासिक तोप चोरी: नरवर किले की अमूल्य विरासत पर डाका, इतिहास की धरोहर की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल…
पहले भी हो चुका था चोरी का प्रयास परंतु नहीं किए गए पुख्ता प्रबंध...

(www.csnn24.com) शिवपुरी। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित ऐतिहासिक नरवर किला सदियों से भारतीय इतिहास, शौर्य और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। यह किला अनेक राजवंशों के उत्थान-पतन, युद्धों और ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। लेकिन अब इसी ऐतिहासिक धरोहर से करीब 400 वर्ष पुरानी अष्टधातु की दुर्लभ तोप चोरी होने की घटना ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी है। इतिहासकार इसे केवल चोरी नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत पर एक गंभीर हमला मान रहे हैं। बताया जा रहा है यह तो सिंधिया रियासत कालीन है।
जानकारी के अनुसार 15-16 जुलाई की दरमियानी रात करीब 12 से 13 हथियारबंद बदमाश नरवर किले में पहुंचे। बदमाशों ने वहां तैनात सुरक्षा गार्ड को हथियारों के बल पर धमकाया और किले में रखी ऐतिहासिक अष्टधातु की तोप को अपने साथ ले गए। चोरी करने वालों की संख्या बढ़ भी सकती है ऐसा बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि आरोपी पूरी तैयारी के साथ आए थे और भारी-भरकम तोप को वाहन में लादकर फरार हो गए।
सूत्रों के अनुसार, 5 जुलाई को भी कुछ संदिग्धों ने इसी तोप को चोरी करने का प्रयास किया था, लेकिन उस समय उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं किए गए, जिसका फायदा उठाकर बदमाशों ने दूसरी बार वारदात को अंजाम दे दिया।
घटना की सूचना मिलते ही शिवपुरी पुलिस अधीक्षक यंगचेन डोलकर भूटिया पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाने के निर्देश दिए और कहा कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है। वहीं राज्य पुरातत्व विभाग, ग्वालियर के उप संचालक पी.सी. महोबिया ने भी घटना को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि चोरी हुई तोप ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण धरोहर थी।
इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है नरवर किला
नरवर किला मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में विंध्य पर्वतमाला की ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। लगभग 500 फीट ऊंची पहाड़ी पर फैला यह विशाल दुर्ग करीब 8 किलोमीटर के क्षेत्र में विस्तृत माना जाता है। इसकी विशाल प्राचीरें, प्राचीन द्वार, महल, मंदिर, जल संरचनाएं और किलेबंदी आज भी मध्यकालीन स्थापत्य कला की उत्कृष्ट मिसाल प्रस्तुत करती हैं।
इतिहासकारों के अनुसार नरवर का प्राचीन नाम नलपुर था। यह स्थान भारतीय महाकाव्य महाभारत और प्रसिद्ध प्रेम कथा राजा नल एवं रानी दमयंती से जुड़ा हुआ माना जाता है। कई ऐतिहासिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में नरवर को राजा नल की राजधानी बताया गया है। यही कारण है कि यह क्षेत्र केवल ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।
अनेक राजवंशों का साक्षी रहा नरवर
नरवर किले का इतिहास लगभग डेढ़ से दो हजार वर्ष पुराना माना जाता है। समय-समय पर अनेक शक्तिशाली राजवंशों ने इस पर शासन किया।
नागवंश और प्रतिहार शासकों का प्रभाव।
कच्छपघात एवं तोमर राजाओं द्वारा किले का विस्तार।
दिल्ली सल्तनत के दौरान सामरिक महत्व।
मुगल शासन में इसे महत्वपूर्ण सैन्य चौकी के रूप में विकसित किया गया।
बाद में मराठाओं और सिंधिया शासन के दौरान भी किले का उपयोग प्रशासनिक एवं सैन्य दृष्टि से होता रहा।
अपनी सामरिक स्थिति के कारण नरवर किला उत्तर भारत और मालवा क्षेत्र को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग की सुरक्षा का प्रमुख केंद्र था।
400 साल पुरानी अष्टधातु की तोप क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
चोरी हुई तोप को विशेषज्ञ लगभग 400 वर्ष पुरानी मानते हैं। माना जाता है कि यह तोप मुगलकाल अथवा उस दौर के किसी शक्तिशाली राजवंश के सैन्य शस्त्रागार का हिस्सा रही होगी।
अष्टधातु आठ धातुओं के मिश्रण से तैयार की जाती है। परंपरागत रूप से इसमें सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, सीसा, टिन, लोहा तथा अन्य धातुओं का मिश्रण होता है। इस मिश्रधातु का उपयोग प्राचीन काल में मूर्तियों, धार्मिक प्रतिमाओं और विशेष सैन्य उपकरणों के निर्माण में किया जाता था।
ऐसी तोपें केवल युद्ध के लिए नहीं बनाई जाती थीं, बल्कि वे उस समय की धातुकला, विज्ञान, सैन्य तकनीक और शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण भी होती थीं। इसलिए उनका ऐतिहासिक महत्व आर्थिक मूल्य से कहीं अधिक होता है।
अंतरराष्ट्रीय तस्करों के निशाने पर भारतीय धरोहरें
इतिहासकारों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की प्राचीन मूर्तियां, धातु प्रतिमाएं, तोपें और अन्य पुरावशेष अंतरराष्ट्रीय तस्करों के निशाने पर रहे हैं। दुर्लभ धातुओं और ऐतिहासिक महत्व के कारण इनकी विदेशों में अवैध बाजार में भारी मांग रहती है।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार चोरी हुई इस अष्टधातु की तोप की अंतरराष्ट्रीय अवैध बाजार में कीमत करोड़ों रुपये तक हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी धरोहरों का वास्तविक मूल्य धन से नहीं आंका जा सकता, क्योंकि वे राष्ट्र की ऐतिहासिक पहचान होती हैं।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इस घटना ने संरक्षित स्मारकों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यदि 5 जुलाई को चोरी का प्रयास हुआ था, तो उसके बाद सुरक्षा क्यों नहीं बढ़ाई गई? स्थानीय लोगों का कहना है कि किले जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल पर पर्याप्त सुरक्षा बल, आधुनिक सीसीटीवी निगरानी और नियमित गश्त की व्यवस्था होनी चाहिए थी।
इतिहास प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि प्रदेश के सभी ऐतिहासिक किलों, मंदिरों और संरक्षित स्मारकों की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
पुलिस की जांच जारी
पुलिस ने घटनास्थल से वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र किए हैं। आसपास के क्षेत्रों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं। तकनीकी जांच, संदिग्ध वाहनों की तलाश और संभावित तस्कर गिरोहों की गतिविधियों पर भी नजर रखी जा रही है। पुलिस अधीक्षक यंगचेन डोलकर भूटिया ने भरोसा दिलाया है कि जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार कर चोरी गई ऐतिहासिक तोप बरामद की जाएगी।
मुख्य बिंदु
15-16 जुलाई की रात 12-13 हथियारबंद बदमाशों ने वारदात को दिया अंजाम।
सुरक्षा गार्ड को धमकाकर 400 साल पुरानी अष्टधातु की ऐतिहासिक तोप चोरी।
5 जुलाई को भी चोरी का प्रयास हुआ था।
नरवर किला भारत के प्राचीन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्गों में शामिल है।
राजा नल-दमयंती की ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
चोरी हुई तोप मुगलकालीन सैन्य विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपये कीमत होने की आशंका।
पुलिस और राज्य पुरातत्व विभाग संयुक्त रूप से मामले की जांच में जुटे हैं।





