
(www.csnn24.com) CSNN NEWS RATLAM आज हम जिन अधिकारों और सुविधाओं को सामान्य मानते हैं, वे कभी किसी की मांग थीं। किसी ने उनके लिए जेल काटी, किसी ने भूख हड़ताल की, किसी ने सड़क पर महीनों धरना दिया और किसी ने अपनी जान तक दांव पर लगा दी। यही संदेश इन तस्वीरों में भी दिखता है — कि अधिकार दिए नहीं जाते, उन्हें संघर्ष से हासिल किया जाता है !
इतिहास गवाह है कि दुनिया भर में श्रमिकों के आंदोलन ने आठ घंटे के कार्यदिवस का अधिकार दिलाया। उत्तराखंड के चिपको आंदोलन ने जंगलों को बचाने के लिए महिलाओं के अद्भुत साहस को दुनिया के सामने रखा। भारत में 2020-21 के किसान आंदोलन ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने तक लंबा और शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रखा। यह लोकतंत्र में जनभागीदारी और शांतिपूर्ण विरोध की एक महत्वपूर्ण मिसाल बना।
इसी क्रम में आज देश के अलग-अलग हिस्सों में भी कई मुद्दों पर आंदोलन जारी हैं। हाल के दिनों में CJP (Cockroach Janta Party) के बैनर तले छात्रों और युवाओं द्वारा परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक के खिलाफ कार्रवाई और जवाबदेही की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन चल रहे हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, हिरासत और राजनीतिक बहस भी देखने को मिली है। आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े हैं, जबकि सरकार सुधार और वार्ता की बात कर रही है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में वर्तमान समय में कई महत्वपूर्ण आंदोलन चल रहे हैं, जो पर्यावरण, आजीविका, संवैधानिक अधिकारों और विकास परियोजनाओं से जुड़े प्रश्न उठा रहे हैं…
1. ब्लैक हरेला आंदोलन
उत्तराखंड में पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर जंगलों और वन्यजीवों को नुकसान पहुँच रहा है। प्रदर्शनकारी जंगल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की मांग कर रहे हैं।
2. केन–बेतवा परियोजना विरोध
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से जुड़ी केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को लेकर कई स्थानीय समुदाय और पर्यावरण समूह विरोध जता रहे हैं। उनका कहना है कि इस परियोजना से विस्थापन, जंगलों की कटाई और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर प्रभाव पड़ सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि यह परियोजना सिंचाई और जल उपलब्धता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।
3. CJP, युवाओं के विरोध प्रदर्शन
दिल्ली में हाल के समय में छात्रों और युवाओं द्वारा परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और जवाबदेही की मांग को लेकर भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। इसमें लद्दाख के शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी शामिल है | वे लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन भी कर चुके हैं। उन्होंने देश के शिक्षा के मुद्दे पर अनशन और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जारी किया है |
भारत में यह पहला अवसर नहीं है जब नागरिक अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे हों। पिछले कुछ वर्षों में किसानों के आंदोलन, लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा की मांग, विभिन्न राज्यों में रोजगार, शिक्षा, पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों से जुड़े अनेक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हाल ही में पुरे देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर स्ट्रीट डॉग और बेज़ुबानों को लेकर भी प्रोटेस्ट किये गये |
हालाँकि, यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण और निहत्थे होकर एकत्र होने तथा अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। हमारे देश में इसे दबाया जाता है , सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के नाम पर लाठी बरसाई जाती है या आसु गैस के गोले फेक दिए जाते है | इसलिए किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसकी मांगों से नहीं, बल्कि उसके शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक स्वरूप से भी तय होती है।
अगर हम इंडिया को डेमोक्रेटिक कंट्री कहते है तो उसमे जनता की बात और विचार दोनों सुने जाने चाहिए | लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाली मीडिया को निष्पक्ष होकर जनता और सत्ता के बिच संवाद बनना चाहिए | जो पुलिस कानून के हाथ कहलाती है यदि वही देश के बच्चो पर लाठिया बरसायेंगे तो उम्मीद क्या की जा सकती है ? लोकतंत्र में विरोध केवल सरकार के खिलाफ खड़े होने का नाम नहीं है, बल्कि शासन और जनता के बीच संवाद स्थापित करने का माध्यम भी है। इतिहास बताता है कि कई बार आंदोलन परिवर्तन का कारण बने हैं | लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि नागरिक अपनी आवाज़ उठा सकें—लेकिन वह आवाज़ संविधान, कानून और अहिंसा की सीमाओं के भीतर रहे। क्योंकि अधिकार और जिम्मेदारियाँ, दोनों मिलकर ही लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं।





