ब्रेकिंग
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: समस्या ‘कुत्तों’ की नहीं, सिस्टम की विफलता ! 18.98 लाख की मशीन खरीदी पर विवाद, अध्यक्ष ने कहा - भुगतान ही नहीं हुआ तो घोटाले का झूठा आरोप क्यों..... राजधानी एक्सप्रेस बनी द बर्निंग ट्रेन.... दो एसी कोच जलकर खाक... NEET पेपर घोटाले के खिलाफ छात्रों का फूटा गुस्सा; कॉलेज गेट पर फूंका शिक्षा मंत्री का पुतला.. श्री गुरु तेग बहादुर एकेडमी की कक्षा 12 वी सीबीएसई बोर्ड परीक्षा का वार्षिक परीक्षा परिणाम 100%... यह रुकावट नहीं, किस्मत का दूसरा मौका है....ASE ACADEMY.... NEET-UG विशेष: री-नीट के फैसले के बाद ‘अभ्यास’ का बड़ा संकल्प — विशेष ‘अभ्यास टेस्ट सीरीज’ से विद्या... बी.एड. (दो वर्षीय) नियमित पाठ्यक्रम के लिये प्रवेश कार्यक्रम जारी। प्रथम चरण की अंतिम तिथि 14 मई 202... रतलाम में अब बदली तस्वीर: जुलवानिया ABC सेंटर में चल रहा व्यवस्थित नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम बंधुआ वोटर' या सियासी मोहरा? कायस्थ समाज की अंधी वफादारी का सिला......'राजनीतिक वनवास और अपमान...
EXCUSIVE/BREKINGदेश

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: समस्या ‘कुत्तों’ की नहीं, सिस्टम की विफलता !

131 पेज का जजमेंट, तोड़ मरोड़ के पेश कर रही कई मीडिया !

Publish Date: May 20, 2026

www.csnn24.com|नई दिल्ली| देश में बढ़ते डॉग बाइट मामलों और आवारा कुत्तों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फाइनल फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि यह मुद्दा केवल “डर” या “हेडलाइंस” का नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत और सिस्टम की विफलता का है|

सार्वजनिक सुरक्षा पर सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पब्लिक सेफ्टी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश में कुत्तों के काटने के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है, जो चिंता का विषय है। अदालत ने राज्यों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ, जिससे समस्या और बढ़ी।

सीमित मामलों में ही इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों को मारने की खुली छूट नहीं है।

सिर्फ इन मामलों में ही अनुमति होगी:

  • रेबीज (Rabies) से संक्रमित कुत्ते
  • लाइलाज बीमारी से ग्रसित कुत्ते
  • अत्यधिक आक्रामक और खतरनाक कुत्ते

इसके अलावा, यह प्रक्रिया भी कानूनी प्रोटोकॉल और ABC नियमों के तहत ही होगी। कोर्ट ने साफ कहा कि यह आदेश क्रूरता को बढ़ावा देने के लिए नहीं है।

किन जगहों से हटाए जाएंगे कुत्ते

अदालत ने निर्देश दिया कि आवारा कुत्तों को कुछ संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों से हटाया जाए लेकिन वह भी तब जब शेल्टर उपलब्ध हो प्रोटोकॉल फॉलो करते हुए जैसे:

  • अस्पताल
  • स्कूल और कॉलेज
  • रेलवे स्टेशन
  • बस स्टैंड
  • स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स

हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इसका मतलब यह नहीं है कि “गली में दिखे कुत्ते को कहीं से भी उठा लो।” सोसायटी, कॉलोनी के वैक्सीनेटेड, स्टरलाइज्ड, नॉन अग्रेसिव, रेजिडेंशियल डॉग्स पर ये नियम लागू नहीं होंगे | अगर उनको पिक भी किया गया तो वापस वहीं छोड़ा जाएगा |

मुख्य समस्या: सिस्टम की विफलता

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की जड़ पर जोर देते हुए कहा कि असली समस्या सिस्टम फेलियर है।

इसमें शामिल हैं:

  • कमजोर नसबंदी (Sterilization) कार्यक्रम
  • अपर्याप्त वैक्सीनेशन
  • योजना और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
  • कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था

नसबंदी और कचरा प्रबंधन सही नहीं होगा, तो हटाए गए कुत्तों की जगह नए कुत्ते आ जाएंगे और समस्या बनी रहेगी,  इसे वैक्यूम इफेक्ट बोलते हैं|

राज्यों को नए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिए हैं क्योंकि पहले भी अगस्त और नवंबर के वर्डिक्ट के बाद एक जगह भी शेल्टर नहीं बना, कई जगह तो एबीसी सेंटर भी नहीं है :

  • हर जिले में ABC सेंटर स्थापित किया जाए
  • प्रशिक्षित स्टाफ और सर्जिकल सुविधाएं उपलब्ध हों
  • सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन का पर्याप्त स्टॉक हो
  • नियमित अनुपालन रिपोर्ट जमा की जाए

पशु क्रूरता पर भी चिंता

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि देश में 9000 से अधिक पशु क्रूरता के मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें एसिड अटैक, जहर देना, मारपीट और वाहन से कुचलने जैसी घटनाएं शामिल हैं।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब वो इस केस को आगे और नहीं सुनेगी, सारी याचिकाएं खारिज़ कर दी गई है | अब जिसे हाई कोर्ट जाना है वह जा सकता है लेकिन वहां भी फैसले एबीसी रूल्स के तहत दिए जाएंगे नहीं तो ये कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट माना जाएगा |

इस आदेश के बाद ये बात भी स्पष्ट है कि ये अब भी ये मुख्य चीजें गैरकानूनी है – 

  • सभी कुत्तों को मार देना, उनके इलाके से रिलोकेट करना
  • कुत्तों को खाना देने वालों को परेशान करना
  • कानून को अपने हाथ में लेना
  • किसी भी स्ट्रीट एनिमल को मारना, ज़हर देना या प्रताड़ित करना
  • फीडर और एनिमल राइट्स में कोई बदलाव नहीं है

मीडिया की भ्रामक कवरेज पर भी सवाल

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच मीडिया की भूमिका भी कटघरे में खड़ी होती दिख रही है। कई जगहों पर आधा-अधूरा या सनसनीखेज नैरेटिव पेश किया गया, जिससे यह धारणा बनी कि कोर्ट ने आवारा कुत्तों को हटाने या मारने की खुली छूट दे दी है। जबकि हकीकत इससे काफी अलग है।

टीआरपी और क्लिकबेट की दौड़ में ग्राउंड रियलिटी को नजरअंदाज कर डर फैलाने वाली हेडलाइंस चलाई गईं, जिससे लोगों में गुस्सा और भ्रम दोनों बढ़ा। कोर्ट के संतुलित रुख—जहां एक तरफ पब्लिक सेफ्टी है और दूसरी तरफ पशु क्रूरता पर रोक—को सही तरीके से सामने लाने के बजाय कई प्लेटफॉर्म्स ने इसे एकतरफा मुद्दा बना दिया।

ऐसे में जिम्मेदार पत्रकारिता की जरूरत और भी बढ़ जाती है, ताकि समाज को तथ्यों पर आधारित, संतुलित और संवेदनशील जानकारी मिल सके, न कि सिर्फ सनसनी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि समस्या न सिर्फ इंसानों की है और न ही सिर्फ जानवरों की—बल्कि सबसे बड़ी विफलता सिस्टम की है।

अदालत का संदेश स्पष्ट है:

सिस्टम को ठीक करें, गुस्सा बेजुबान जानवरों पर न निकालें। सारी चीजें अब ABC रूल्स, लॉस को बेस मानकर होगी जो AWBI द्वारा बनाई गई हैं, पार्लियामेंट द्वारा पास की गई हैं | 

Show More

Sheemon Nigam

Chief Editor csnn24.com | BJMC +MJMC | Artist by Passion, Journalist by Profession | MD of Devanshe Enterprises, Video Editor of Youtube Channel @buaa_ka_kitchen and Founder of @the.saviour.swarm | Freelance Zoophilist, Naturalist & Social Worker. Podcastor and Blogger | Fresh Experience as Anchor, Content creator and Editor in Media Industry | CACT AWBI & Member of PFA India, Peta India and PAL Foundation Mumbai.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Slot Site
Back to top button
Don`t copy text!