Sharad Purnima : 6 अक्टूबर के दिन शरद पूर्णिमा की पूजा की जाएगी
शरद पूर्णिमा पर 2 शुभ योग का निर्माण हो रहा है

www.csnn24.com | : सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह त्योहार हर आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस साल 6 अक्टूबर 2025 को शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। आपको बता दें कि इस दिन स्नान-दान के साथ-साथ मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। इसके साथ ही इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। मान्यता है कि इस दिन रात को अमृत बरसता है। इसलिए रात के समय खुले आसमान के नीचे खीर रखना शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार चंद्रमा की रोशनी में खीर रखकर खाने से इंसान का भाग्योदय होता है और रोग-बीमारियों से मुक्ति मिलती है।
शरद पूर्णिमा की कथाएँ
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसी दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए धन प्राप्ति के लिए भी ये तिथि सबसे उत्तम मानी जाती है। वहीं इस साल शरद पूर्णिमा पर वृद्धि योग भी बन रहा है। जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है।
आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जिसे कोजागिरी पूर्णिमा और कुमार पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित है कि कोजागिरी पूर्णिमा वह दिन है जब चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त दिखाई देता है, जो चंद्रमा की विभिन्न कलाएँ हैं। इस पावन पर्व को कोजागिरी लक्ष्मी पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि यह दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित है।
इस पूर्णिमा को मनाने के पीछे कई किंवदंतियाँ और पौराणिक कथाएँ हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, मगध नामक देश में धनंजय नामक राजा रहता था। वर्षा की कमी और विभिन्न रोगों के कारण, उसका देश भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा था। अपने मुख्य पुरोहित के सुझाव पर, रानी और राजा ने शरद पूर्णिमा का व्रत रखा और पूरी रात जागकर देवी लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा की। परिणामस्वरूप, चंद्र देव ने अपनी दिव्य किरणों से उनके देश को रोगमुक्त जीवन का आशीर्वाद दिया और देवी लक्ष्मी ने उन्हें समृद्ध जीवन का आशीर्वाद दिया। उस दिन से लोग भगवान चंद्रमा और देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए व्रत रखने लगे।
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, शरद पूर्णिमा की इसी रात भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी राधा और वृंदावन की गोपियों के साथ दिव्य रासलीला रचाई थी। बृजभूमि की एक प्रचलित कथा के अनुसार, गोपियाँ कृष्ण की बांसुरी की जादुई धुन से जाग उठती थीं। वे शरद पूर्णिमा की रात कृष्ण के साथ नृत्य करने के लिए अपने घरों से चुपके से पास के जंगल में चली जाती थीं। दयालु भगवान कृष्ण प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य करने के लिए स्वयं का प्रतिरूप धारण करते थे। यह भी माना जाता है कि राधा और वृंदावन की गोपियों के साथ भगवान कृष्ण का भक्ति नृत्य (भक्ति रास) ब्रह्मलोक की एक दिव्य रात के बराबर होता था, जो हजारों मानव वर्षों के बराबर होता है। इस प्रकार, उनकी दिव्यता को याद करने के लिए, भगवान कृष्ण के भक्त अपने जीवनसाथी और प्रियजनों के साथ शरद पूर्णिमा की पूरी रात मनाते हैं।
क्यों खास होती है खीर?
शरद पूर्णिमा की रात खीर का प्रसाद बनाना अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन बनी खीर देवी-देवता ओं को अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और घर में सुख समृद्धि का वास होता है। स्कंद पुराण में भी उल्लेख है कि शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखने से उसका सेवन अमृत के समान फलदायी होता है। खीर को पवित्रता, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है।
चांद की रोशनी में खीर रखने का मुहूर्त और चंद्रोदय समय
वैदिक पंचांग के मुताबिक आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि 6 अक्टूबर को दोपहर में 12 बजकर 23 मिनट पर आरंभ होगी। साथ ही इसका समापन 7 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 19 मिनट पर होगा। ऐसे में शरद पूर्णिमा 6 अक्टूबर को ही मनाई जाएगी।
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय शाम 05 बजकर 31 मिनट पर होगा। पंचांग के अनुसार, 6 अक्टूबर को रात 10.38 बजे से लेकर रात 12.08 बजे तक लाभ-उन्नति मुहूर्त रहने वाला है। लेकिन इस बीच रात 10.53 बजे तक भद्रा भी रहेगा | इसलिए आप भद्रा काल से बचते हुए उन्नति मुहूर्त में किसी भी समय खीर रख सकते हैं।
इस साल शरद पूर्णिमा का त्योहार वृद्धि योग के संयोग में मनाया जाएगा। इस दिन वृद्धि योग सुबह से ही शुरू हो जाएगा और दोपहर 01 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। ज्योतिष में इस संयोग को बेहद शुभ माना जाता है। इस योग में पूजा का दोगुना फल प्राप्त होता है।





