‘असली मुद्दा 2.0’ : सच्चे सवाल, लाखों आवाजें ,कई सबूत व गवाह ! एक सच्चाई – क्या होगी सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार या फिर अनसुनी ?
संक्षय बब्बर के 'असली मुद्दा 1.0' ने किये कई ख़ुलासे ! भारतीय कुत्तों के पक्ष में लेटर पिटीशन से लेकर ट्वीटोथॉन तक, कैंडल मार्च, पूजा यज्ञ तक लगातार लोगो का प्रदर्शन जारी ...

www.csnn24.com| सुप्रीम कोर्ट ने 18 दिसंबर 2025 को कहा कि वह आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में अगली सुनवाई के दौरान एक वीडियो चलाएगा, ताकि जानवरों के साथ “अमानवीय” व्यवहार किए जाने के दावों की जांच की जा सके ! यह टिप्पणी दिल्ली नगर निगम (MCD) द्वारा बनाए गए नियमों पर उठी आपत्तियों के संदर्भ में की गई। मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि गुरुवार को सुनवाई के लिए गठित तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ को रद्द कर दिया गया है। न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि अब इस मामले की सुनवाई 7 जनवरी 2026 को की जाएगी।
सिब्बल ने दलील दी कि एमसीडी ने वैधानिक प्रावधानों के विपरीत नियम बनाए हैं और चेतावनी दी कि अधिकारी दिसंबर में ही इन नियमों को लागू करना शुरू कर देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्याप्त आश्रय स्थलों की व्यवस्था किए बिना आवारा कुत्तों को हटाया जा रहा है और इस प्रक्रिया को “बेहद अमानवीय” बताया।
इस पर न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि अदालत अगली तारीख पर इस मुद्दे पर विचार करेगी और टिप्पणी की, “उन्हें करने दीजिए, हम इस पर विचार करेंगे।” जब सिब्बल ने तत्काल सुनवाई की मांग की, तो न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि अगली सुनवाई में एक वीडियो चलाया जाएगा “ताकि आपसे पूछा जा सके कि मानवता क्या है।” इसके जवाब में सिब्बल ने कहा कि जमीनी हालात दिखाने के लिए वे भी वीडियो प्रस्तुत करेंगे !
क्या है मामला ?
इससे पहले, 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे संस्थागत क्षेत्रों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में “चिंताजनक वृद्धि” का संज्ञान लेते हुए आवारा कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद तुरंत निर्धारित आश्रय स्थलों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी आदेश दिया था कि स्थानांतरित किए गए कुत्तों को उनके मूल स्थान पर वापस न छोड़ा जाए। अदालत ने प्रशासनिक उदासीनता और प्रणालीगत विफलता का हवाला देते हुए राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों तथा एक्सप्रेसवे से सभी मवेशियों और आवारा जानवरों को हटाने का भी निर्देश दिया। ये निर्देश 28 जुलाई को स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए शुरू किए गए एक मामले में दिए गए थे, जो विशेष रूप से दिल्ली में बच्चों को प्रभावित करने वाली रेबीज से जुड़ी कुत्तों के काटने की घटनाओं की रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ था।

देश भर में विरोध जारी…
जबकि लगातर देश में इसका पूर्ण रूप से कड़ा विरोध किया जा रहा है ! सभी छोटी बड़ी संस्थाएं , इन्फ्लुएंसर , एनिमल एक्टिविस्ट , एनजीओ , ग्रुप्स व् इंडिविजुअल एनिमल लवर अपने अपने स्थर पर इसका विरोध कर रहे है ! लोगो ने मिलकर लाखो लेटर्स भी लिखे, एक समय पर एक साथ ट्वीट्स भी किये , अलग अलग स्थान पर एक समय पर कैंडल मार्च , यज्ञ हवन , साइलेंट प्रोटेस्ट सब जारी है केवल अपने बेज़ुबानों को बचाने के लिये ! पोस्टर ड्राइव , सोशल मीडिया पोस्ट शेयरिंग , टैग वायरल सब तरीको से लोग सपोर्ट कर रहे है ताकि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को बदले !

“असली मुद्दा” प्रेस कॉन्फ्रेंस से हुए चौंका देने वाले ख़ुलासे
एक ऐसे समय में जब सुर्खियाँ अक्सर जनता में भय फैलाने के लिए रची जाती हैं, एक अनूठी आवाज़ ने वर्षों से भारतीय शहरी इलाकों में घर किए कथानक को चुनौती दी है। एनिमल एक्टिविस्ट संक्षय बब्बर, जिन्हें हाल ही में “जानवरों से नफरत करने वालों के लिए नई डर की शक्ल” के रूप में सराहा गया है ! उनका हालिया “असली मुद्दा” प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ सड़क के कुत्तों का बचाव ही नहीं किया, इसने प्रशासनिक धोखाधड़ी और व्यवस्था की क्रूरता की एक परिष्कृत संरचना को बेनकाब कर दिया !
“5-वैक्सीन स्कैम”: एक संकट का निर्माण
संक्षय बब्बर के खुलासे का मुख्य केंद्र यह है कि कैसे कुत्तों के “बिते समय से उत्पन्न डर” को मनगढ़ंत तरीके से बढ़ाकर वास्तविक संकट का रूप दिया गया। RTI (सूचना के अधिकार) डेटा और गहन जांच में पता चला कि प्रशासनिक मशीनरी आंकड़ों में “वैक्सीन गुणक” का इस्तेमाल कर खतरे को रातों-रात बढ़ा देती है।
आंकड़ों का हेरफेर
जब कोई व्यक्ति काटा जाता है, तो सामान्य चिकित्सा प्रोटोकॉल के अनुसार एंटी-रेबीज़ वैक्सीन (ARV) की पाँच खुराकें दी जाती हैं। बब्बर के अनुसार, कई नगर पालिकाओं के रिकॉर्ड में इन पाँच खुराकों को पाँच अलग “डॉग बाइट” – कुत्ते के काटने की घटनाओं के रूप में दर्ज किया जाता है। इससे खतरे का आंकड़ा पाँच गुना बढ़ जाता है।
गलत वर्गीकरण और रेबीज़ मिथक
जांच में यह भी सामने आया कि बिल्ली के खरोंच, बन्दर के काटने और यहाँ तक कि गैर-जानवर दुर्घटनाओं जैसे जंग लगे गेट पर खरोंच लगना, को भी अक्सर “कुत्ते के काटने” के रूप में दर्ज किया जाता है, ताकि मुफ्त टीके जारी किए जा सकें।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूब्लिक में यह मान लिया गया है कि वे एक खतरनाक रेबीज़ महामारी के बीच रह रहे हैं, जबकि तथ्य बताते हैं कि दिल्ली, मुंबई और गोवा जैसे बड़े शहरों में 2022 के बाद से किसी भी आधिकारिक रिकॉर्ड में रेबीज़ से मौत का कोई मामला नहीं है। यह दर्शाता है कि सोशल मीडिया पर फैलाए गए भय और अस्पतालों के वास्तविक आंकड़ों में भारी अंतर है।
करोड़ों पैसा कहाँ गया ?
अगर “समस्या” मनगढ़ंत है, तो सवाल यह है – किसे फ़ायदा हुआ ? बब्बर की जांच का इंगित करना है कि Animal Birth Control (ABC) प्रोग्राम के प्रबंधन में भारी वित्तीय गड़बड़ियाँ हैं।
जहाँ हर साल करोड़ों रुपये सड़क के कुत्तों के नसबंदी और टीकाकरण के लिए आवंटित किए जाते हैं, वहीं नगर पालिकाओं जैसे MCD पर गंभीर लापरवाही के आरोप हैं। कुत्तों की संख्या का लगातार बढ़ना प्रकृति की विफलता नहीं, बल्कि शासन की विफलता है। ABC नियम 2023 के लागू न होने से यह समस्या बनी हुई है, जिससे कुछ अधिकारियों को एक समस्या से लाभ होता रहता है जिसे कभी हल नहीं किया जाता।
“डैथ ट्रैप” आश्रय
बब्बर ने स्थायी “शेल्टर्स” के लिए हो रहे प्रचार के बारे में भी चेतावनी दी। भले ही वे मानवीय लगते हैं, पर बब्बर उन्हें “कैनाइनों के लिए मृत्यु-जैसी जगहें” कहते हैं। दिल्ली में ऐसे सुविधाओं का निर्माण और रखरखाव का अनुमानित खर्च लगभग ₹15,000 करोड़ बताया गया, जो शहर के पूरे वार्षिक स्वास्थ्य बजट से भी अधिक है – “हमसे स्वास्थ्य प्रणाली को कर्ज़ में डालने के लिए एक ऐसे समाधान पर खर्च करने को कहा जा रहा है जो काम नहीं करता, जबकि असली दोषी बिना सज़ा के घूम रहे हैं।”
असली मुद्दा 1.0 से 2.0 तक
संक्षय बब्बर ने सिर्फ जानवरों के अधिकारों का बचाव करने की भूमिका से आगे बढ़कर इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(g) — जो हर नागरिक का दायित्व बताता है कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा रखनी चाहिए — के लिए लड़ाई में परिवर्तित किया है।
ऐसा कर वह न केवल सड़क के कुत्तों की रक्षा कर रहे हैं बल्कि उन भीड़ वाले न्यायिक आदेशों का सामना भी कर रहे हैं जिनका उपयोग अवैध रूप से जानवरों को हटाने, विष देने और बुरी तरह मारने के लिए किया जाता है।
“असली मुद्दा 1.0” प्रेस कॉन्फ़्रेंस, अब YouTube पर वायरल हो चुकी है, केवल पहला चरण था। बब्बर पहले ही “असली मुद्दा 2.0” का संकेत दे चुके हैं, जिसमें जानवरों के क्रूर व्यवहार के मनोवैज्ञानिक कारणों की गहराई से जांच की जाएगी।
प्रारंभिक निष्कर्ष एक चिंता जनक संबंध सुझाते हैं – जानवरों के प्रति क्रूर व्यवहार अक्सर मानव-पर-मानव गंभीर अपराधों जैसे मनोवैज्ञानिक विकृति, घरेलू हिंसा और बाल दुर्व्यवहार के पूर्वाभास के रूप में देखा जा सकता है।
सोशल मीडिया पर सच्चाई हो रही वायरल, एनिमल फीडर व स्ट्रीट डॉग्स पर हो रही क्रूरता , देश के ABC सेंटर्स की हालत बेहद भयानक !
देश भर के एनिमल वेलफेयर पेज द्वारा कई वीडियो और सबूत पेश किये जा रहे है जिसमे ABC सेंटर्स की भयानक हालत साफ़ स्पष्ट है ! कई जगह से फीडर व् स्ट्रीट डॉग्स को सताने परेशान करने के वीडियो भी आ रहे है ! सांसद स्वाति मालीवाल ने भी संसद में कुत्तों और गायों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया | कई पॉपुलर टीवी शोज का हिस्सा रह चुके एक्टर अनुज सचदेवा पर भी हमला हो गया। एक्टर ने खुद इस मारपीट का वीडियो रिकॉर्ड कर बताया है कि उन पर सोसाइटी के रहनेवाले एक शख्स ने हमला किया है | वीडियो में सुनाई दे रहे ऑडियो के अनुसार, ये विवाद कुत्तों की वजह से हुआ है। हाल ही में सोनादी नजफगढ़ एबीसी सेंटर (एमसीडी) का भी खुलासा हुआ ! ऐसे हज़ारो सबूत है जो सुप्रीम कोर्ट अनदेखा व अनसुना कर रही है !
जगह जगह ILLEGAL DAIRY MAFIA गौमाता को अपने मुनाफ़े के लिए शोषित कर रहा है। हर रोज़ ना जाने कितनी गायों को हम घायल अवस्था में सड़कों पर देखते हैं।
ऐसा ही हाल Stray Dogs का है, सबको उठाकर शेल्टर में डालना कोई समाधान नहीं है।
संसद में बेज़ुबानों के लिए आज आवाज़ उठाई… pic.twitter.com/DTCw0FB87U
— Swati Maliwal (@SwatiJaiHind) December 16, 2025
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निष्कर्ष : क्या हम सच्चाई के लिए तैयार हैं?
अब राष्ट्र एक मोड़ पर खड़ा है। क्या हम उस “निर्मित भय” के आगे झुकते रहेंगे जो पड़ोसी को पड़ोसी से लड़वाता है, या हम संक्षय बब्बर जैसे एक्टिविस्ट द्वारा प्रदर्शित कठिन डेटा को स्वीकार करेंगे ? असली मुद्दा 1.0” ने प्रशासनिक दक्षता का नकाब उठाया है। अब जब दुनिया 2.0 के खुलासों का इंतज़ार कर रही है, सवाल यह है – क्या हम खोए हुए करोड़ों के लिए जवाबदेही मांगेंगे, उन जिन्दगियों के लिए जिन्हें यह धोखे ने प्रभावित किया—मानव और जानवर दोनों ? या क्या हम चुप रहकर इस खेल को जारी रखने देंगे ? सच्चाई वहां है—RTI फ़ाइलों और सड़कों पर खून-भरे प्रमाणों में । अब समय है कि हम गौर से देखें।
अरावली पहाड़ियों से लेकर आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों को लेकर व्यापक सार्वजनिक बहस और आलोचना हो रही है, जिसके चलते अदालत को दोनों ही मामलों में अपने आदेशों पर पुनर्विचार करना चहिए ताकि इन फैसलो से प्रकृति से खिलवाड़ न हो क्योकि यदि प्रकृति अपने फ़ैसले सुनाने लगेगी तो सभी जानते है की क्या मंजर होगा ?!
क्योंकि यह सिर्फ दिल्ली की नहीं, बल्कि पूरे देश की स्थिति है। ये मासूम और निर्दोष जीव भारत के हर कोने में मौजूद हैं—कहीं खुश, तो कहीं ज़िंदगी से जूझते हुए। आप किसी एक सड़क की भी कल्पना नहीं कर सकते जहाँ वे न हों। वे हमारी सड़कों की जीवंत धड़कन हैं।असल समस्या यह है कि फेक मीडिया और जानवरों से नफरत करने वाले लोग—जो इस मौजूदा हालात की असली जड़ हैं—ने आवारा जानवरों की एक झूठी और डरावनी छवि गढ़ दी है। समाज के लिए असली खतरा ये एनिमल हैटर्स हैं, जिनका एकमात्र एजेंडा है—इन जानवरों को अपने आसपास से हटाना।
और दुखद यह है कि सुप्रीम कोर्ट सच्चाई देखने और सुनने को तैयार नहीं दिखता। अब सवाल पूरे देश का है—क्या सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, जो कभी ‘माननीय’ कहा जाता था, आज ऐसे असंवेदनशील और अविवेकपूर्ण फैसले देकर भी वही सम्मान बनाए रख सकता है?
हम पूछते हैं—
आवारा जानवरों और अरावली पहाड़ियों को लेकर लिए जा रहे ये फैसले क्या वास्तव में मानवीय हैं?




