सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणियाँ और मीडिया की गलत व्याख्या ले रही है बेजुबानों की जान
सामाजिक कार्यकर्ता संक्षय बब्बर और अंकुश गुप्ता द्वारा प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया सहित कई बड़े समाचार संस्थानों के खिलाफ शिकायत दर्ज

www.csnn24.com| भारत का सुप्रीम कोर्ट न्याय का सर्वोच्च मंदिर है। यहां की हर टिप्पणी, हर अवलोकन और हर आदेश का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन जब अदालत की टिप्पणियों को संदर्भ से काटकर, आधा-अधूरा या सनसनीखेज़ तरीके से पेश किया जाता है, तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं और आज इसका सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं बेजुबान जानवर।
टिप्पणी और आदेश के बीच का फर्क
हाल के दिनों में आवारा और सामुदायिक कुत्तों के प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान कुछ टिप्पणियां की गईं। ये टिप्पणियां सरकारों और नगर निकायों की जवाबदेही तय करने के लिए थीं, न कि कुत्तों को सड़कों से हटाने या मारने के निर्देश के रूप में। लेकिन दुर्भाग्यवश, इन टिप्पणियों को मीडिया और कुछ प्रभावशाली समूहों ने ऐसे पेश किया, मानो अदालत ने आवारा कुत्तों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश दे दिया हो।
इस गलत व्याख्या का सीधा असर ज़मीन पर दिखा। कई जगहों पर कुत्तों को “खतरनाक” बताकर ज़हर दिया गया, उन्हें जबरन दूसरी जगहों पर छोड़ा गया या मार दिया गया। पशु प्रेमियों और फीडरों, खासतौर पर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाएं सामने आईं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन कृत्यों को “सुप्रीम कोर्ट के आदेश” का नाम देकर जायज़ ठहराने की कोशिश की गई, जबकि वास्तविक आदेश ऐसा कोई अधिकार नहीं देता।
मीडिया और समाज की जिम्मेदारी
न्यायालय की टिप्पणियां अंतिम आदेश नहीं होतीं, लेकिन मीडिया उन्हें अक्सर अंतिम सत्य की तरह पेश करता है। इससे न केवल कानून का गलत संदेश जाता है, बल्कि समाज में डर, नफरत और हिंसा को भी बढ़ावा मिलता है। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह कानूनी तथ्यों को सही संदर्भ में प्रस्तुत करे, न कि टीआरपी या क्लिक के लिए आधे सच को पूरी सच्चाई बनाकर परोसे।

न्याय, करुणा और संवैधानिक मूल्य
भारत का संविधान न केवल मानव अधिकारों की बात करता है, बल्कि करुणा और नैतिक जिम्मेदारी का भी संदेश देता है। बेजुबान जानवर खुद अपना पक्ष नहीं रख सकते। जब न्यायिक टिप्पणियों की गलत व्याख्या उनकी जान लेने लगे, तो यह सिर्फ पशु अधिकारों का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रणाली और समाज की संवेदनशीलता का भी सवाल बन जाता है।
सामाजिक कार्यकर्ता संक्षय बब्बर और अंकुश गुप्ता ने शिकायत दर्ज कराई
न्यायिक अखंडता और बेजुबान जानवरों के जीवन की रक्षा के उद्देश्य से सामाजिक कार्यकर्ता संक्षय बब्बर और अंकुश गुप्ता ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) सहित कई बड़े समाचार संस्थानों के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़ी सुनवाई की भ्रामक और गलत रिपोर्टिंग ने न केवल जनता में भय का माहौल बनाया, बल्कि इसके परिणामस्वरूप कुत्तों की अवैध हत्या और पशु प्रेमियों, विशेषकर महिलाओं फीडरों, के उत्पीड़न को बढ़ावा मिला।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की गलत व्याख्या
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, मीडिया रिपोर्ट्स में यह गलत संदेश फैलाया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाने का आदेश दे दिया है। जबकि वास्तविकता यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ऐसा कोई सार्वभौमिक निर्देश नहीं दिया गया है। अदालत का आदेश केवल स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील संस्थानों तक सीमित था और उसका मुख्य जोर राज्य सरकारों और नगर निकायों की जवाबदेही पर था।
“मुआवजे” और “जुर्माने” को लेकर फैली गलत खबरें
कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि कुत्तों के काटने की घटनाओं पर फीडरों से भारी जुर्माना वसूला जाएगा। शिकायत के मुताबिक यह दावा पूरी तरह भ्रामक है। सुप्रीम कोर्ट ने दरअसल राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा था कि यदि वे ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, 2023’ को लागू करने में विफल रहती हैं, तो उन्हें पीड़ितों को मुआवजा देना पड़ सकता है, न कि व्यक्तिगत फीडरों को।
फीडर खासतौर पर महिलाओं के साथ गाली-गलौज और मारपीट की घटनाएं बढ़ीं
शिकायत में यह भी कहा गया है कि कुत्तों को “खतरनाक” बताकर पेश की गई खबरों से ऐसा माहौल बना, जिससे फीडरों खासतौर पर महिलाओं के साथ गाली-गलौज और मारपीट की घटनाएं बढ़ीं।
एक गंभीर आरोप के अनुसार, तेलंगाना में कथित तौर पर मीडिया की गलत रिपोर्टिंग का हवाला देकर लगभग 500 कुत्तों को ज़हर देकर मार दिया गया, और स्थानीय अधिकारियों ने इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन बताया जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत है।
कानूनी स्थिति स्पष्ट है !
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि समुदायिक कुत्तों का अवैध स्थानांतरण या परित्याग एक दंडनीय अपराध है। एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम, 2023 के तहत नसबंदी और टीकाकरण के लिए पकड़े गए कुत्तों को उसी क्षेत्र में वापस छोड़ा जाना अनिवार्य है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। उन्हें जंगलों, हाईवे या अन्य कॉलोनियों में छोड़ना कानून का सीधा उल्लंघन है। इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता, 2023 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत जानवरों की हत्या, अपंगता या जबरन विस्थापन संज्ञेय अपराध हैं, जिनमें पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि आवारा कुत्तों का प्रबंधन नगर निकायों की जिम्मेदारी है, न कि निजी व्यक्तियों या रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (RWA) की।

48 घंटे में स्पष्टीकरण और माफी की मांग
संक्षय बब्बर और अंकुश गुप्ता ने PTI से 48 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण और सार्वजनिक माफी की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि भ्रामक रिपोर्टिंग में सुधार नहीं किया गया, तो वे इस मामले को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और आवश्यकता पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे। यह मामला मीडिया की जिम्मेदारी, न्यायिक आदेशों की सटीक रिपोर्टिंग और बेजुबान जानवरों के संवैधानिक व कानूनी संरक्षण को लेकर एक अहम बहस को जन्म देता है।
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ऑनरेबल की जगह हॉरिबल जज कहा जा रहा है…
आमजनता में, विशेष रूप से पशु-विरोधी सोच रखने वाले कुछ लोग हाल के दिनों में अत्यधिक सक्रिय हो गए हैं। वे कथित और अप्रमाणित अख़बार रिपोर्ट्स व ख़बरों का सहारा लेकर बिना किसी ठोस कारण के मासूम स्ट्रीट डॉग्स को पकड़वाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही, जो लोग नियमित रूप से इन पशुओं की देखभाल करते हैं या उन्हें भोजन कराते हैं, उन्हें परेशान किया जा रहा है और उनके विरुद्ध निराधार शिकायतें दर्ज करवाई जा रही हैं।
चिंताजनक बात यह है कि कई स्थानों पर नगर निगम द्वारा इन शिकायतों की उचित जाँच-पड़ताल किए बिना ही कार्रवाई की जा रही है। सोशल मीडिया पर इससे जुड़े अनेक वीडियो सामने आ रहे हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं।
इसी संदर्भ में, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक माननीय न्यायाधीश द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों पर भी समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा सवाल उठाए गए हैं और विचार व्यक्त किए गए हैं। कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों – जिनमें शांतनु नायडू, मेनका गांधी, जॉन अब्राहम, सोनू सूद, ए. आर. रहमान, मोहित चौहान, मीका सिंह, करुणा कंचन सहित अन्य सार्वजनिक हस्तियाँ शामिल हैं – ने इस विषय पर करुणा, संवेदनशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
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सोशल मीडिया पर लोग अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं और यह भावना उभर कर आ रही है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर टिप्पणियाँ संतुलित, समावेशी और मानवीय दृष्टिकोण के साथ की जानी चाहिए। कुछ यूज़र्स ने यह भी कहा है कि एकतरफ़ा या असंवेदनशील टिप्पणियाँ समाज में गलत संदेश दे सकती हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ वीडियो भी वायरल हो रहे हैं जिनमें अदालत की कार्यवाही के दौरान जज के हाव-भाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं – जैसे सुनवाई के दौरान रुचि की कमी का आभास या महिला अधिवक्ता की बात बीच में काटे जाने जैसी बातें। इन वीडियो ने भी सार्वजनिक विमर्श को और तेज़ कर दिया है।
यह पूरा मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि स्ट्रीट एनिमल्स से जुड़े मुद्दों को भावनाओं के बजाय कानून, विज्ञान और करुणा के संतुलन के साथ समझा और सुलझाया जाना चाहिए, ताकि न केवल इंसानों बल्कि मूक पशुओं के अधिकारों की भी रक्षा हो सके | सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को दोपहर 2:00 बजे पुनः करेगा। हमें आशा है कि बुद्धिमत्ता, विज्ञान और करुणा न्यायालय को एक मानवीय और संतुलित निर्णय की ओर मार्गदर्शन देंगे क्योंकि असंख्य मूक जीवन उस फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं।





