श्रावण माह 11 जुलाई 2025 से प्रारंभ, जानिए इस महीने क्यों होती है शिव पूजा फलदायी ?
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की शुरुआत आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से होती है

www.csnn24.com| सनातन धर्म में वर्षभर के बारह महीनों में श्रावण मास (सावन) का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व माना गया है। यह मास भगवान शिव को समर्पित होता है और इसी महीने में उनकी आराधना करने से भक्तों को शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की शुरुआत आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से होती है और यह मास श्रावण पूर्णिमा तक चलता है। यह समय वर्षा ऋतु का होता है जब प्रकृति हरी-भरी हो जाती है और वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
सावन 2025 प्रारंभ तिथि और समाप्ति तिथि
उत्तर भारत में यह शुक्रवार, 11 जुलाई से शनिवार, 9 अगस्त तक और दक्षिण एवं पश्चिमी भारत में 25 जुलाई से 23 अगस्त तक मनाया जाएगा।
| सोमवार व्रत | तारीख | दिन |
| प्रथम सावन सोमवार व्रत | 14 जुलाई, 2025 | सोमवार |
| दूसरा सावन सोमवार व्रत | 21 जुलाई, 2025 | सोमवार |
| तीसरा सावन सोमवार व्रत | 28 जुलाई, 2025 | सोमवार |
| चौथा सावन सोमवार व्रत | 4 अगस्त, 2025 | सोमवार |
व्रत त्योहार की लिस्ट
- 12 जुलाई शनिवार जया पार्वती व्रत
- 15 जुलाई मंगलवार नाग पंचमी (कृष्ण पक्ष)
- 16 जुलाई बुधवार कर्क संक्रांति
- 17 जुलाई गुरुवार कालाष्टमी
- 21 जुलाई सोमवार सावन का दूसरा सोमवार व्रत, कामिका एकादशी
- 22 जुलाई मंगलवार भौम प्रदोष व्रत
- 23 जुलाई बुधवार सावन शिवरात्रि
- 24 जुलाई गुरुवार हरियाली अमावस्या
- 27 जुलाई रविवार हरियाली तीज
- 29 जुलाई मंगलवार नाग पंचमी (शुक्ल पक्ष)
- 31 जुलाई गुरुवार तुलसीदास जयंती
- 5 अगस्त मंगलवार श्रावण पुत्रदा एकादशी
- 6 अगस्त बुधवार प्रदोष व्रत
- 8 अगस्त शुक्रवार वरलक्ष्मी व्रत
- 9 अगस्त शनिवार रक्षाबंधन, नारली पूर्णिमा, श्री सत्यनारायण व्रत
सावन में शिव पूजा क्यों होती है फलदायक ?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो चौदह रत्नों के साथ कालकूट विष भी निकला। यह विष इतना प्रचंड और घातक था कि उससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब समस्त देवताओं और ऋषियों के आग्रह पर भगवान शिव ने इस विष को अपनी कंठ में धारण किया जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने उन्हें गंगाजल अर्पित किया और बेलपत्र, धतूरा, आक आदि से उनका अभिषेक किया। मान्यता है कि यह समुद्र मंथन श्रावण मास में ही हुआ था। इसलिए इस मास में शिवजी का जलाभिषेक, बेलपत्र अर्पण, उपवास, रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप अत्यंत फलदायक माना गया है।
श्रावण मास के अन्य धार्मिक पक्ष
धर्म और साधना का चातुर्मास का विशेष समय यह मास तप, उपवास, ब्रह्मचर्य और संयम का प्रतीक है। साधक इस मास में विशेष रूप से शिव पुराण, रुद्राष्टाध्यायी, शिव तांडव स्तोत्र आदि का पाठ करते हैं। श्रावण मास में जो भी संकल्प लेकर पूजा की जाती है, वह शीघ्र ही पूर्ण होती है। यह समय मनोकामनाओं की पूर्ति का मास है। महिलाएं और पुरुष सावन के सोमवार को व्रत रखकर शिवजी से उत्तम जीवनसाथी, संतान सुख, सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। यह व्रत अत्यंत फलप्रद माना जाता है। इस मास में लाखों शिवभक्त गंगाजल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यह यात्रा भक्ति, त्याग और आत्मसमर्पण की प्रतीक मानी जाती है।




